साक्षी जोशी के पोस्ट का पूरा सच: 24 कैरेट फ्रॉड का असली चेहरा और घरेलू हिंसा की इनसाइड स्टोरी | UP News Network

नोएडा / दिल्ली (UP News Network): डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में ‘दिखावा’ और ‘असलियत’ के बीच की दूरी कितनी खौफनाक हो सकती है, इसका एक जीता-जाता और बेहद डरावना उदाहरण हाल ही में सामने आया है। वरिष्ठ पत्रकार साक्षी जोशी की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने कथित बुद्धिजीवियों, उदारवादियों (Liberals) और खुद को महिला अधिकारों का मसीहा बताने वाले चेहरों के पीछे छिपे भयानक सच को उजागर कर दिया है। इस पोस्ट के सामने आने के बाद दिल्ली-एनसीआर से लेकर देश के राजनैतिक और पत्रकारिता जगत में एक ’24-कैरेट फ्रॉड’ को लेकर इनसाइड स्टोरी की चर्चाएं तेज हो गई हैं, जिसने बंद दरवाजों के पीछे नारीवाद (Feminism) का ढोंग रचकर अपनी ही पार्टनर पर अमानवीय और क्रूर अत्याचार किए हैं।
सिमोन द बुअवार का मुकुट और हैवानियत का चेहरा साक्षी जोशी के खुलासे के मुताबिक, जिस व्यक्ति पर ये गंभीर आरोप लग रहे हैं, वह समाज के सामने खुद को महिला सशक्तिकरण और स्त्री मुक्ति का इतना बड़ा पैरोकार दिखाता है कि कभी-कभी आम जनता को भ्रम हो जाता है कि प्रसिद्ध फ्रेंच लेखिका सिमोन द बुअवार के स्त्री मुक्ति पर लिखे महान उपन्यास “द सेकेंड सेक्स” का असली लेखक शायद वही है। लेकिन यह बौद्धिक मुखौटा सिर्फ दुनिया की आँखों में धूल झोंकने के लिए था। घर की चारदीवारी के भीतर इस रंगे सियार ने अपनी ही पार्टनर को ऐसी अमानुषिक और दर्दनाक यातनाएं दे रखी हैं, जिसे सुनकर रूह कांप जाए। इस कड़वे सच का विश्लेषण करते हुए आलोचकों का कहना है कि जिस रोज़ यह पूरी दास्ताँ सबूतों के साथ पूरी तरह सामने आएगी, उस रोज़ लोग बॉलीवुड की मशहूर फिल्म “खून भरी मांग” में पत्नी पर हुए डरावने अत्याचारों की कहानी को भी भूल जाएंगे।
अवैध रिश्तों का फ्राइपैन और हवस की लत इस पूरे मामले की गहराई में जाएं तो यह कहानी समाज में फैले एक ऐसे छद्म चरित्र को बेनकाब करती है, जो भूत-प्रेत, कुत्ता-बिल्ली और सांप-छछूंदर की कहानियों के सहारे अपनी फर्जी बौद्धिकता की दुकान चलाता है। इस फ्रॉड व्यक्ति के लिए नैतिकता के कोई मायने नहीं हैं। लेखक और विश्लेषकों ने इस पर बेहद तीखा प्रहार करते हुए कहा है कि इस व्यक्ति के लिए शराब की बोतल मिनिरल वॉटर की तरह है और स्त्रियां केवल लार टपकाते हुए खाई जाने वाली कोई आइसक्रीम! इसकी जिंदगी अवैध रिश्तों का एक ऐसा फ्राइपैन बन चुकी है, जिसमें हर रोज़ हवस की भूख मिटाने के लिए नए चेहरों का इस्तेमाल किया जाता है और समाज के सामने ‘नारीवाद’ का पोस्टर बॉय बनकर घूमा जाता है।
पीड़ित की खामोशी और ‘पोएटिक जस्टिस’ का इंतज़ार इस पूरी घिनौनी कहानी की जो मुख्य किरदार (पीड़ित महिला) है, वह आज भी समाज की बंदिशों, लोक-लाज और स्त्री की मर्यादा की लक्ष्मण रेखा के चलते पूरी तरह शांत है। उसने खुद को हवस के इस पुजारी से अलग तो कर लिया है और एक अंतर्मुखी जीवन जी रही है, लेकिन सवाल यह है कि यह ज्वालामुखी कब तक शांत रहेगा? ‘यूपी न्यूज़ नेटवर्क’ का मानना है कि रंगे सियार की खाल का रंग एक न एक दिन ज़रूर छूटता है और पापी की नियति को एक रोज़ रूठना ही पड़ता है। समाज और कानून को अब उस ‘पोएटिक जस्टिस’ (कुदरती न्याय) की प्रतीक्षा है, जिसका अंकुर इस खुरदुरी ज़मीन से फूटना तय है। समय भले ही थोड़ा लंबा हो सकता है, लेकिन इस पापी का अंतहीन ढोंग अब और ज़्यादा दिनों तक नहीं टिकेगा।