यूपी का महासंग्राम: अमित शाह बनाम योगी आदित्यनाथ के असली समीकरण का सच

यूपी का महासंग्राम: दिल्ली दरबार बनाम लखनऊ — क्या है असली सियासी सच?
उत्तर प्रदेश की राजनीति का वो सच, जो बड़े-बड़े न्यूज़ रूम में दबा दिया जाता है, उसे बिना डरे और निष्पक्ष रूप से आपके सामने लाना ही ‘UP News Network’ का सबसे बड़ा मकसद है।
आज हम बात कर रहे हैं देश और उत्तर प्रदेश की सत्ता के उस सबसे बड़े त्रिकोण की, जिसकी चर्चा अंदर ही अंदर दिल्ली से लेकर लखनऊ के सत्ता के गलियारों में सबसे तेज़ है। यह त्रिकोण है—प्रधानमंत्री नरेंद्र Modi, गृह मंत्री अमित शाह, और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच का। क्या वाकई दिल्ली और लखनऊ के बीच सबकुछ ठीक है? या फिर पर्दे के पीछे एक ऐसा राजनीतिक शह-मात का खेल चल रहा है, जिसने उत्तर प्रदेश में एक बड़ी सियासी हलचल पैदा कर दी है? आज हम इसी की परत-दर-परत पड़ताल करेंगे।
अमित शाह वर्सेस योगी आदित्यनाथ: असली समीकरण
राजनीति के जानकार और ग्राउंड की रिपोर्टिंग करने वाले इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कभी भी दिल्ली दरबार की पहली पसंद नहीं थे। साल 2017 में जब अचानक उनका नाम मुख्यमंत्री के तौर पर सामने आया, तो उसके बाद से ही अंदरूनी खींचतान का एक लंबा सिलसिला शुरू हो गया था।
खबरें तो यहां तक हैं कि उनके पहले कार्यकाल के दौरान, खुद बीजेपी के 125 से ज़्यादा विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ विधानसभा में हल्ला बोल दिया था। बात सिर्फ विधायकों की नहीं थी, मुख्यमंत्री को डिस्टर्ब करने के लिए लखनऊ में उनके मन का कोई भी स्थाई डीजीपी (DGP) तक नहीं बनने दिया गया। यहां तक कि वो अपने मन का चीफ सेक्रेटरी बनाना चाहते थे, लेकिन दिल्ली ने अपने खास ब्यूरोक्रेट को एक्सटेंशन देकर दो-दो बार उत्तर प्रदेश भेज दिया ताकि मुख्यमंत्री की प्रशासनिक ताकत को कम किया जा सके।
इसके पीछे का असली कारण क्या है? दरअसल, केंद्र की राजनीति में गृह मंत्री अमित शाह को सबसे बड़ा प्रशासक और नीति निर्माता माना जाता है। लेकिन जैसे ही यूपी के मुख्यमंत्री का चेहरा पूरे देश में उभरने लगा—जब वो बंगाल से लेकर गुजरात और केरल तक बीजेपी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक बन गए, तो दिल्ली को यह बात खलने लगी। “मोदी जी के बाद अगला कौन?” इस सवाल ने दिल्ली बनाम लखनऊ की इस अंदरूनी जंग को और ज़्यादा हवा दे दी।
टिकट बंटवारे का फैसला और सियासी नुकसान
अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश में हुए पिछले बड़े चुनाव की, जहां बीजेपी को एक बहुत बड़ा झटका लगा और उनकी सीटें काफी कम हो गईं। यहां तक कि वे अयोध्या जैसी वीआईपी सीट भी हार गए। आखिर ऐसा क्यों हुआ?
कहा जाता है कि दिल्ली के कुछ बड़े सलाहकारों और दिल्ली दरबार ने खुद उत्तर प्रदेश का टिकट बंटवारा तय किया था। मुख्यमंत्री जिन चेहरों को टिकट देना चाहते थे, उन्हें किनारे कर दिया गया और दिल्ली ने अपनी ज़िद पर ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारा जिन्हें जनता पूरी तरह नकार चुकी थी। परिणाम क्या हुआ? बीजेपी उत्तर प्रदेश में बुरी तरह पिछड़ गई।
यह हार किसकी थी? यह हार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की नहीं, बल्कि दिल्ली के उन रणनीतिकारों की थी जो बंद कमरों में बैठकर यूपी की जातिगत राजनीति को समझने का दावा कर रहे थे। लेकिन इस हार के बाद भी खींचतान रुकी नहीं है। मुख्यमंत्री को कमज़ोर करने के लिए उनके पैरेलल (बराबर) नॉर्थ-ईस्ट से आने वाले एक और फायरब्रांड मुख्यमंत्री को देश के सामने खड़ा किया जा रहा है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि विकल्प और भी मौजूद हैं।
कट्टर हिंदुत्व बनाम जातिगत राजनीति
उत्तर प्रदेश की सत्ता में इस समय सबसे बड़ा द्वंद्व चल रहा है कि आगे की राजनीति किस रास्ते पर चलेगी? दिल्ली दरबार का मानना है कि अब हिंदू-मुस्लिम का नैरेटिव पुराना हो चुका है और आगे का चुनाव जीतने के लिए पिछड़ों और दलितों की जातिगत राजनीति के कार्ड को खेलना होगा। इसी रणनीति के तहत दिल्ली से कई मंत्रियों और नेताओं को यूपी में खुली छूट दी गई है, जो बार-बार बयान देते हैं कि “संगठन सरकार से बड़ा है”।
लेकिन दूसरी तरफ, यूपी के मुख्यमंत्री अपने ही तेवर में अड़े हुए हैं। वे एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। उनका साफ़ मानना है कि उनकी राजनीति सिर्फ और सिर्फ ध्रुवीकरण, कट्टर हिंदुत्ववाद और ‘बटोगे तो कटोगे’ के नारे पर ही चलेगी। वे दिल्ली के बनाए मंत्रियों को भाव तक नहीं देते, जिससे दिल्ली दरबार में रोना-धोना और शिकायतें मची हुई हैं।
स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि जनता को यह दिखाने के लिए कि “सबकुछ ठीक है”, खुद प्रधानमंत्री को लखनऊ आकर मुख्यमंत्री के कंधे पर हाथ रखकर फोटो खिंचवानी पड़ती है। लेकिन हकीकत यह है कि इस पक्ष के अंदर ही एक बहुत बड़ा विपक्ष बैठा हुआ है, जो लगातार एक-दूसरे को छोटा करने में लगा है।