भरत तिवारी एनकाउंटर पर भिड़े मोदी सरकार के दो दिग्गज मंत्री; जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बयानों से गरमाई देश की राजनीति

भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर एनडीए (NDA) के भीतर छिड़ी जुबानी जंग, एक तरफ जहां मांझी ने पुलिसिया कार्रवाई को ठहराया सही, वहीं चिराग पासवान ने दोषी पुलिसकर्मियों पर कड़ी सजा की मांग कर खड़े किए बड़े सवाल

भरत तिवारी एनकाउंटर का मामला अब केवल उत्तर प्रदेश या स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसकी गूंज देश की राजधानी दिल्ली और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के गलियारों तक पहुंच चुकी है। इस कथित मुठभेड़ को लेकर मोदी कैबिनेट के दो सबसे प्रमुख सहयोगी दलों के मंत्रियों के बीच सीधी वैचारिक जंग छिड़ गई है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान (लोक जनशक्ति पार्टी-रामविलास) इस पूरे मामले पर आमने-सामने आ गए हैं। दोनों नेताओं के बयानों ने इस विवाद को एक नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है, जिसने न केवल शासन-प्रशासन बल्कि एनडीए गठबंधन के भीतर के अंतर्विरोधों को भी सतह पर ला खड़ा किया है।
जीतन राम मांझी का तीखा रुख: ‘वो अपराधी था’
इस पूरे घटनाक्रम पर बात करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने पुलिसिया कार्रवाई का खुलकर समर्थन किया है। कानून-व्यवस्था और अपराधियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की वकालत करते हुए मांझी ने साफ शब्दों में कहा, “अगर पुलिस को मारना ही होता, तो वह सिर में गोली मारती। वह एक अपराधी था।” मांझी का यह बयान साफ तौर पर इस बात की ओर इशारा करता है कि पुलिस ने आत्मरक्षा में या कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई की है। उन्होंने विरोधियों और सवाल उठाने वालों पर निशाना साधते हुए कहा कि अपराधियों के मानवाधिकारों पर बात करने से पहले उनके द्वारा किए गए अपराधों और समाज पर उनके प्रभाव को देखा जाना चाहिए। मांझी का मानना है कि पुलिस जब अपराधियों पर कार्रवाई करती है, तो उस पर राजनीति करना सुरक्षा बलों के मनोबल को कमजोर करता है।
चिराग पासवान का पलटवार: ‘दोषी पुलिसकर्मियों को मिलेगी सजा’
मांझी के इस बयान के ठीक विपरीत, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने पीड़ित परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए पुलिस की इस थ्योरी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। चिराग पासवान ने बेहद कड़े लहजे में कहा, “हम ऐसी ओछी राजनीति नहीं करते। इस मामले में जो भी पुलिसकर्मी दोषी पाए जाएंगे, उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।” चिराग ने साफ किया कि उनकी राजनीति हमेशा न्याय और समाज के हर वर्ग के अधिकारों की रक्षा पर आधारित रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी एनकाउंटर या पुलिसिया कार्रवाई के नाम पर कानून को हाथ में लेने या निर्दोषों के अधिकारों के हनन की इजाजत नहीं दी जा सकती। चिराग पासवान का यह बयान यह साफ करता है कि वे इस मामले में निष्पक्ष जांच और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं।
एनडीए के भीतर बढ़ता वैचारिक मतभेद
इस घटनाक्रम ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर एक दिलचस्प और गंभीर स्थिति पैदा कर दी है। एक ही गठबंधन और एक ही कैबिनेट का हिस्सा होने के बावजूद दो बड़े मंत्रियों के बयानों में यह जमीन-आसमान का अंतर यह दिखाता है कि इस एनकाउंटर को लेकर गठबंधन के भीतर एक राय नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जहां जीतन राम मांझी का बयान कानून-व्यवस्था के प्रति एक बेहद सख्त और आक्रामक संदेश देने की कोशिश है, वहीं चिराग पासवान का रुख दलित, शोषित और पीड़ित परिवारों के बीच अपनी न्यायप्रिय छवि को बरकरार रखने की रणनीति का हिस्सा है।
यह पहली बार नहीं है जब किसी एनकाउंटर को लेकर राजनीतिक दलों में खींचतान देखी गई हो, लेकिन केंद्र सरकार के दो कैबिनेट मंत्रियों का इस तरह खुलकर एक-दूसरे के विपरीत स्टैंड लेना इस मुद्दे की संवेदनशीलता और इसके पीछे छिपी गहरी राजनीति को बयां करता है।
क्या है भरत तिवारी एनकाउंटर का पूरा मामला?
इस पूरे विवाद की जड़ में वह कथित पुलिस मुठभेड़ है, जिसके बाद से लगातार स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सवाल उठाए जा रहे हैं। पुलिस का दावा है कि उक्त व्यक्ति एक कुख्यात अपराधी था और उस पर कई आपराधिक मामले दर्ज थे। मुठभेड़ के दौरान पुलिस ने आत्मरक्षा में गोलियां चलाईं, जिसमें उसकी मौत हो गई। वहीं दूसरी तरफ, पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया ‘फर्जी एनकाउंटर’ है। परिवार का कहना है कि उसे जबरन फंसाया गया और न्याय की उम्मीदों का गला घोंट दिया गया। इसी असंतोष और आक्रोश को देखते हुए विपक्षी दलों ने भी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, जिसके बाद अब एनडीए के घटक दल भी इस पर बंटे हुए नजर आ रहे हैं।
प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में खलबली
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बयानों के बाद उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक महकमे और लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में खलबली मची हुई है। विपक्ष को इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का एक और बड़ा हथियार मिल गया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि जब सरकार के अपने ही मंत्री पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल उठा रहे हैं और सजा की मांग कर रहे हैं, तो साफ है कि दाल में कुछ काला है।
प्रशासनिक स्तर पर इस मामले की निष्पक्ष जांच कराने का दबाव अब कई गुना बढ़ गया है। यदि जांच में पुलिस की भूमिका पर कोई भी आंच आती है, तो यह स्थानीय पुलिस प्रशासन के साथ-साथ राज्य सरकार के लिए भी एक बड़ी असहज स्थिति पैदा कर देगा। वहीं, अगर पुलिस की थ्योरी सही साबित होती है, तो चिराग पासवान जैसे नेताओं के बयानों पर भी सवाल उठेंगे।
निष्कर्ष: न्याय और राजनीति के बीच फंसा मामला
भरत तिवारी के इस पूरे मामले ने एक बार फिर देश में एनकाउंटर संस्कृति, पुलिस की कार्यप्रणाली और उस पर होने वाली राजनीति को बहस के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ जहां समाज का एक वर्ग अपराधियों के खिलाफ त्वरित और सख्त कार्रवाई का समर्थक है, वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन को लेकर भी उतनी ही मजबूत आवाजें उठ रही हैं।
अब देखना यह होगा कि इस उच्च स्तरीय राजनीतिक बयानबाजी के बाद क्या इस मामले की कोई स्वतंत्र या न्यायिक जांच बैठाई जाती है। चिराग पासवान का न्याय दिलाने का वादा और जीतन राम मांझी का पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराना, दोनों ही बातें आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति में एक नया समीकरण तय करेंगी। लेकिन इन सब के बीच, सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या पीड़ित परिवार को वास्तविक न्याय मिल पाएगा या यह मामला केवल राजनीतिक रोटियां सेकने का जरिया बनकर रह जाएगा?