बिहार पुलिस फजीहत: सामूहिक दुष्कर्म और कथित फर्जी मुठभेड़ के मामलों से बढ़े सवाल, सत्ता पक्ष के नेता भी नाराज

बिहार पुलिस फजीहत के बीच बेगूसराय, पटना और भोजपुर की घटनाओं ने कानून-व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल; सरकार ने न्यायिक जांच के दिए संकेत।

बिहार पुलिस फजीहत इन दिनों राज्य की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है। बेगूसराय और पटना में सामने आए सामूहिक दुष्कर्म के मामलों के साथ-साथ भोजपुर जिले में कथित फर्जी मुठभेड़ के आरोपों ने बिहार पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थिति यह है कि विपक्ष ही नहीं, बल्कि सरकार के अपने मंत्री और वरिष्ठ नेता भी पुलिस कार्रवाई पर खुलकर सवाल उठा रहे हैं।
बीते कुछ दिनों में हुई तीन बड़ी घटनाओं ने राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर बहस को तेज कर दिया है। इन घटनाओं में कहीं न कहीं पुलिस की कथित लापरवाही, गैर-जिम्मेदारी और अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप सामने आए हैं।
सबसे पहले बात बेगूसराय की। यहां एक महिला के साथ पांच लोगों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म किए जाने का मामला सामने आया। पीड़िता और उसके परिवार का आरोप है कि घटना से करीब तीन महीने पहले उन्हीं आरोपियों के खिलाफ छेड़छाड़ की शिकायत स्थानीय थाने में दर्ज कराई गई थी। हालांकि, आरोप है कि पुलिस ने समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शुरुआती शिकायत पर सख्ती दिखाई जाती, तो बाद में इतनी गंभीर घटना को रोका जा सकता था। मामला सामने आने के बाद पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठे और संबंधित थानाध्यक्ष को निलंबित कर दिया गया।
दूसरी घटना राजधानी पटना की है, जहां दो सगी बहनों के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया। पीड़िताओं का आरोप है कि उन्हें एक तिलक समारोह में प्रस्तुति देने के बहाने बुलाया गया था, लेकिन रास्ते में उन्हें बंधक बनाकर उनके साथ अपराध किया गया।
इस मामले में भी पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठे हैं। लोगों का कहना है कि मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी में देरी और सीमित कार्रवाई से जनता में असंतोष बढ़ा है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक इस माम.ले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
तीसरी और सबसे चर्चित घटना भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव की है, जहां 17 जून 2026 को पुलिस मुठभेड़ में भरत तिवारी नामक युवक की मौत हो गई। परिजनों और कई सामाजिक संगठनों ने इसे फर्जी मुठभेड़ करार दिया है।
मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया, जब विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कई नेताओं ने भी निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। आरोप लगाया जा रहा है कि युवक आत्मसमर्पण करना चाहता था और उसे जीवित गिरफ्तार किया जा सकता था।
बढ़ते विवाद के बीच राज्य सरकार ने मामले की न्यायिक जांच कराने का संकेत दिया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा है कि मामले की जांच उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में कराई जाएगी, ताकि सच्चाई सामने आ सके।
कृषि मंत्री विजय सिन्हा ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को परेशान नहीं किया जाना चाहिए और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा। वहीं, शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा कि यदि आरोपी को गिरफ्तार किया जा सकता था, तो उसकी जान लेना उचित नहीं माना जा सकता।
पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने भी घटना पर चिंता व्यक्त करते हुए निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं ने बिहार पुलिस की जवाबदेही और कार्यप्रणाली को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई की जा रही है? क्या पुलिस बल को संवेदनशील मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध हैं? और क्या मुठभेड़ जैसे मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा रही है?
कानून के जानकारों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि पुलिस पर लगातार सवाल उठते हैं, तो इससे न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।
फिलहाल, बिहार की राजनीति में यह मुद्दा लगातार गर्माता जा रहा है। आने वाले दिनों में न्यायिक जांच की दिशा, पुलिस की कार्रवाई और सरकार के अगले कदम तय करेंगे कि इन मामलों में जवाबदेही किस स्तर तक तय होती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार पुलिस पर लग रहे आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? और क्या इन घटनाओं से सबक लेकर कानून-व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे?
UP News Network इस पूरे मामले पर अपनी नजर बनाए हुए है। जैसे-जैसे नए तथ्य सामने आएंगे, हम आपको हर अपडेट से अवगत कराते रहेंगे।