यौन अपराधों में न्यायिक संवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: पटना और इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसलों पर शीर्ष अदालत ने जताई गहरी नाराजगी, कहा- आदेशों की होगी विस्तृत समीक्षा
यौन अपराधों में न्यायिक संवेदनशीलता को ताक पर रखकर निचली अदालतों द्वारा दिए जा रहे फैसलों पर भड़का देश की सर्वोच्च अदालत का गुस्सा; नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की गाइडलाइंस और हैंडबुक को अनिवार्य रूप से लागू करने के सख्त निर्देश
यौन अपराधों में न्यायिक संवेदनशीलता और महिला सुरक्षा के बेहद नाजुक मामलों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर बेहद कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। देश की आधी आबादी के अधिकारों और उनकी शारीरिक गरिमा से जुड़े कानूनी प्रावधानों की व्याख्या पर शीर्ष अदालत ने जो सख्त रुख दिखाया है, उसने देश के न्यायिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। दरअसल, पटना हाई कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा हाल ही में महिलाओं के खिलाफ हुए यौन हमलों के मामलों में दी गई कुछ कानूनी व्याख्याओं और ऐतिहासिक रूप से अजीबोगरीब फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत गहरी नाराजगी और चिंता व्यक्त की है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष खंडपीठ ने बुधवार को एक बेहद गंभीर मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट शब्दों में यह संकेत दिया है कि सर्वोच्च अदालत इन विवादित आदेशों की गहराई से समीक्षा करेगी और निचली अदालतों के लिए एक विस्तृत व सख्त मार्गदर्शिका (आदेश) जारी करेगी।
⚖️ क्या थे वो फैसले, जिन पर भड़का सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा?
यह पूरा कानूनी विवाद उस समय शीर्ष अदालत के सामने उजागर हुआ, जब एक मामले की सुनवाई के दौरान उपस्थित अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को पटना और इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो अलग-अलग फैसलों के बारे में जानकारी दी। यह पूरा घटनाक्रम इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक संबंधित मामले पर चल रहे स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) याचिका की सुनवाई के दौरान पूरी गहराई के साथ बेंच के सामने आया।
बेंच के सामने जो कानूनी तर्क और निचली अदालतों के निष्कर्ष रखे गए, वे बेहद चौंकाने वाले थे:
पटना हाई कोर्ट का विवादित फैसला: पटना हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में एक ऐसी अजीबोगरीब कानूनी व्याख्या कर दी, जिससे हर कोई सन्न रह गया। अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि कोई व्यक्ति किसी महिला की मर्जी के बिना उसकी ‘सलवार उतारने की कोशिश’ करता है और उसकी ‘छाती दबाकर छेड़छाड़’ करता है, तो इसे कानून की नजर में ‘रेप की कोशिश’ (Attempt to rape) नहीं माना जाएगा। इस फैसले ने महिला संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों को हतप्रभ कर दिया था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की हैरान करने वाली व्याख्या: इसी तरह के एक अन्य गंभीर मामले में, जिसमें पीड़िता एक नाबालिग बच्ची थी, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी संवेदनशीलता की सभी सीमाओं को लांघते हुए एक विवादित निर्णय सुनाया था। कोर्ट ने उस मामले में आरोपी द्वारा नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ने, उसके पजामे का नाड़ा खोलने और उसे खींचकर पुलिया के नीचे ले जाने की हिंसक व यौनिक कोशिशों को भी ‘रेप का प्रयास’ मानने से साफ इनकार कर दिया था।
निचली अदालतों के इन फैसलों का सीधा संदेश यह निकल रहा था कि जब तक यौन हिंसा का कृत्य पूरी तरह से संपन्न नहीं हो जाता, तब तक आरोपी के खिलाफ कड़ी धाराओं में मुकदमा चलाना या उसे उस स्तर की सजा देना उचित नहीं है। इसी रूढ़िवादी और संवेदनहीन सोच पर सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ का गुस्सा पूरी तरह से फूट पड़ा।
📜 नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की गाइडलाइंस को मिली मंजूरी
इस अत्यंत संवेदनशील और गंभीर कानूनी मोड़ पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और दूरगामी फैसला लिया है। शीर्ष अदालत ने ‘नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी’ (National Judicial Academy) की एक्सपर्ट कमेटी द्वारा तैयार की गई एक विशेष और विस्तृत रिपोर्ट को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है।
यह रिपोर्ट कोई सामान्य कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह देश के न्यायाधीशों के लिए एक बुनियादी व्यावहारिक संहिता (Hand Book) है। इस रिपोर्ट में साफ तौर पर यह दिशा-निर्देश (Guidelines) दिए गए हैं कि जब भी किसी अदालत के सामने यौन अपराधों या महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले आएं, तो न्यायिक कार्यवाही के दौरान न्यायाधीशों को किस प्रकार की संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और पीड़िताओं के प्रति किस तरह का सहानुभूतिपूर्ण व निष्पक्ष रवैया अपनाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों की अदालतों, चाहे वह हाई कोर्ट हों या जिला अदालतें, को कड़े लहजे में निर्देश दिया है कि वे इन मंजूर की गई गाइडलाइंस और हैंडबुक का अक्षरशः व पूरी तरह से पालन सुनिश्चित करें। अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि देश की न्यायिक व्यवस्था में पीड़िताओं का दोबारा मानसिक उत्पीड़न (Secondary Victimization) किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
🌍 “विदेशी कानून नहीं, भारतीय सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप हों नियम”
इस ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण और बुनियादी बात कही, जो भारतीय कानूनी इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा कि यौन अपराधों और महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से निपटने के लिए हमारे जो भी नियम, कानून और न्यायिक व्याख्याएं होनी चाहिए, वे पूरी तरह से भारत की वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों, सांस्कृतिक परिवेश और यहां की महिलाओं की जमीनी स्थिति के अनुरूप होने चाहिए।
सर्वोच्च अदालत ने निचली अदालतों की इस प्रवृत्ति पर कटाक्ष किया, जहां केवल विदेशी कानूनों, पाश्चात्य न्यायशास्त्र की पुरानी किताबों या भारत की सामाजिक वास्तविकता से कटे हुए विदेशी फैसलों का हवाला देकर अपराधियों को तकनीकी रूप से राहत दे दी जाती है। कोर्ट का मानना है कि भारतीय समाज में किसी महिला की मर्जी के बिना उसकी पोशाक को हाथ लगाना या उसके अंगों के साथ हिंसक छेड़छाड़ करना उसके मानसिक और सामाजिक अस्तित्व को खत्म करने जैसा है, इसलिए इसे किसी भी प्रकार से हल्की धारा का अपराध नहीं माना जा सकता।
🚨 न्याय व्यवस्था में महिलाओं का विश्वास बहाल करने की बड़ी कवायद
यह पूरा घटनाक्रम भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक बड़े रिफॉर्म यानी सुधार के रूप में देखा जा रहा है। यह सीधे तौर पर दर्शाता है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर देश की सबसे बड़ी अदालत कितनी ज्यादा सख्त और सजग है। शीर्ष अदालत ऐसे कठोर संदेशों और फैसलों के माध्यम से देश की सभी निचली अदालतों को यह साफ संदेश दे रही है कि यौन हिंसा से जुड़े मामलों में पुरानी, पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी सोच को छोड़कर पूरी तरह से संवेदनशील और ‘पीड़ित-केंद्रित’ (Controlling Victim-Centric Approach) दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।
अक्सर देखा जाता है कि अदालतों में सुनवाई के दौरान पीड़िताओं से ऐसे अजीबोगरीब और अपमानजनक सवाल पूछे जाती हैं या फैसलों में ऐसी टिप्पणियां की जाती हैं, जिससे पीड़िता न्याय मांगने की प्रक्रिया से ही डरने लगती है। सुप्रीम कोर्ट का यह हालिया रुख महिलाओं के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने और आम जनता, विशेषकर देश की महिलाओं के भीतर हमारी पूरी न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास को कई गुना बढ़ाने की दिशा में एक बेहद क्रांतिकारी और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
🔍 निष्कर्ष और आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त नाराजगी के बाद अब यह पूरी तरह तय हो गया है कि आने वाले दिनों में पटना और इलाहाबाद हाई कोर्ट के इन फैसलों को पूरी तरह से बदला या संशोधित किया जा सकता है। शीर्ष अदालत द्वारा दी गई विस्तृत हैंडबुक देश के हर उस जज के लिए एक अनिवार्य पाठ बनने जा रही है, जो महिला अपराधों की सुनवाई करते हैं। यह ऐतिहासिक कदम भारतीय कानूनी इतिहास में यह सुनहरे अक्षरों में दर्ज करेगा कि न्याय केवल अंधा नहीं होता, बल्कि देश की आधी आबादी के सम्मान को बचाने के लिए वह पूरी तरह से संवेदनशील, सजग और कठोर भी हो सकता है।

