आचार्य प्रमोद कृष्णम का अखिलेश यादव पर सीधा हमला, पूछा- ‘काशी, मथुरा और भोजशाला पर सपा प्रमुख अपना स्टैंड साफ करें’
लखनऊ/नोएडा:
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर वैचारिक और धार्मिक मुद्दों को लेकर घमासान छिड़ गया है। अपने बेबाक बयानों के लिए चर्चा में रहने वाले वरिष्ठ राजनेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने इस बार समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव पर बेहद सीधा और तीखा हमला बोला है। आचार्य प्रमोद कृष्णम ने देश के सबसे संवेदनशील और आस्था से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए मांग की है कि अखिलेश यादव अब इन पर चुप्पी तोड़ें और देश के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करें।
🚨 ‘मुसलमानों को गुमराह करने वाली राजनीति का असली चेहरा आए सामने’
आचार्य प्रमोद कृष्णम ने विपक्ष की राजनीति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि कुछ राजनीतिक दल सिर्फ वोट बैंक के लिए अल्पसंख्यकों को गुमराह करते आए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुसलमानों को गुमराह करके और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नफरत करने के लिए उकसाने वाली राजनीति को अब अपना असली चेहरा देश के सामने दिखाना चाहिए। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि नफरत की बुनियाद पर खड़े इस राजनीतिक ढोंग की हकीकत अब जनता के सामने आनी ही चाहिए।
🏛️ काशी, मथुरा और भोजशाला पर मांगा खुला स्टैंड
इस राजनीतिक हमले को और धार देते हुए आचार्य प्रमोद कृष्णम ने अखिलेश यादव के सामने सीधे सवाल दागे हैं। उन्होंने मांग की है कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख धार (मध्य प्रदेश) की भोजशाला के साथ-साथ करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र काशी और मथुरा के विवादों पर भी अपना स्टैंड पूरी तरह साफ़ करें। उनका कहना है कि अब वह समय आ गया है जब देश को यह अच्छी तरह पता चलना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता (Secularism) के नाम पर चल रहे इस ‘फर्जी सेक्युलरिज्म’ की हकीकत आखिर क्या है।
मुख्य बिंदु: आस्था, इतिहास और राजनीतिक चुप्पी
वोट बैंक की राजनीति पर सवाल: यह बयान सिर्फ एक सामान्य राजनीतिक हमला नहीं है, बल्कि उन क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों की जड़ों पर सवाल उठाता है जो धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर एकतरफा तुष्टिकरण की राजनीति करने के आरोपों से घिरे रहते हैं।
सिर्फ आस्था नहीं, पहचान का मुद्दा: राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि काशी, मथुरा और भोजशाला जैसे विषय अब सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि ये देश के प्राचीन इतिहास, सांस्कृतिक पहचान और कानूनी न्याय से भी गहराई से जुड़े हैं।
🔍 चुप्पी भी बहुत कुछ बोलती है
आचार्य प्रमोद कृष्णम के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है कि ऐसे संवेदनशील ऐतिहासिक मुद्दों पर बड़े नेताओं की चुप्पी भी कई बार उनके असली स्टैंड से ज़्यादा बहुत कुछ बोल जाती है। अब देश की जनता के सामने सवाल बिल्कुल साफ़ और सीधा है कि राजनीतिक दलों का सेक्युलरिज्म सच में देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान है, या फिर यह सिर्फ चुनाव के समय अपना वोट बैंक बचाने और तुष्टिकरण साधने का एक राजनीतिक हथियार मात्र बनकर रह गया है?

